Murudeshwar Temple History: रावण को यहां मिला था अमरता का वरदान, जानें Lord Shiva के आत्मलिंग की पूरी कहानी

May 07, 2026
Astro Panchang
भारत मंदिरों का देश है और हमारे देश में कई ऐसे कई प्राचीन मंदिर हैं। जिनका संबंध या तो किसी दूसरे युग से है या फिर उनका इतिहास हजारों साल पुराना है। आज हम आपको ऐसे एक ही मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसका इतिहास रामायण काल से जुड़ा है। इसका संबंध दशानन रावण से है। यह मंदिर कर्नाटक में कन्नड़ जिले की भटकल तहसील में स्थित है। जोकि तीन ओर से अरब सागर से घिरा हुआ है। समुद्र तट पर स्थित होने की वजह से इस मंदिर के आसपास का नजारा बेहद खूबसूरत लगता है।
दरअसल, हम यहां पर बात कर रहे हैं मुरुदेश्वर मंदिर की, जोकि भगवान शिव को समर्पित है। मुरुदेश्वर भगवान शिव का एक नाम है। इस मंदिर की खासियत यह है कि इसको परिसर में भगवान शिव की एक विशाल मूर्ति स्थापित है। जिसको दुनिया की दूसरी सबसे विशाल और ऊंची शिव प्रतिमा माना जाता है। शहर को पहले मृदेश्वर के नाम से जाना जाता था। हालांकि बाद में मंदिर के निर्माण के बाद इसका नाम बदलकर मुरुदेश्वर कर दिया गया था।
दशानन रावण से संबंध
पौराणिक कथाओं के मुताबिक जब दशानन रावण अमरता का वरदान पाने के लिए भगवान शिव की तपस्या कर रहा था। तब भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उसको एक शिवलिंग दिया। जिसको आत्मलिंग कहा जाता है। महादेव ने रावण से कहा कि अगर तुम अमर होना चाहते हो, तो इस शिवलिंग को लेकर लंका में स्थापित कर देना। लेकिन इस शिवलिंग को जिस भी जगह पर रख दोगे, यह वहीं पर स्थापित हो जाएगा। भगवान शिव के कहे मुताबिक रावण शिवलिंग लेकर लंका जा रहा था।
इस बीच रास्ते में भगवान गणेश ने चालाकी से रावण को लंका भेज दिया कि शिवलिंग को गोकर्ण में जमीन पर रख दिया। जिससे वह शिवलिंग वहीं पर स्थापित हो गया। इससे क्रोधित होकर दशानन शिवलिंग को उखाड़ने और नष्ट करने की कोशिश करने लगा और शिवलिंग के टूटे हुए टुकड़े फेंक दिया। इस क्रम में जिस वस्त्र से शिवलिंग ढका हुआ था। वह म्रिदेश्वर के कन्दुका पर्वत पर जा गिरा। म्रिदेश्वर को ही अब मुरुदेश्वर के नाम से जाना जाता है। शिव पुराण में इस कथा का विस्तार से वर्णन मिलता है।