Bhimashankar Temple Facts: त्रिपुरासुर वध से जुड़ी कथा और Bhimashankar Temple का रोचक इतिहास

Bhimashankar Temple Facts: त्रिपुरासुर वध से जुड़ी कथा और Bhimashankar Temple का रोचक इतिहास

भगवान शिव के पवित्र 12 ज्योतिर्लिंग के दर्शन मात्र से ही तमाम बाधाएं, ग्रह दोष, बुरे विचार और नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं। सावन के महीने में द्वादश ज्योतिर्लिंगों में किसी एक भी ज्योतिर्लिंग के दर्शन करना उस समान ही पुण्य देता है, जितना की चारधाम यात्रा से मिलता है। क्योंकि इस दौरान महादेव धरती पर निवास करते हैं और जो भी भक्त सच्चे मन से उनकी प्रार्थना करते हैं, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से छठवें ज्योतिर्लिंग 'भीमाशंकर' के बारे में बताने जा रहे हैं।


शिव महापुराण में भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों का श्वलोक

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम् उज्जयिन्यां महाकालं ओम्कारममलेश्वरम् ॥


परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशंकरं सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने ॥


वारणस्यां तु विश्र्वेशं त्रयंम्बकं गौतमीतटे हिमालये तु केदारं घृश्नेशं च शिवालये ॥


एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति ॥

भीमाशंकर मंदिर का इतिहास

त्रेतायुग में त्रिपुरसुर नामक दैत्य था। उसने भगवान शिव की पूजा कर उनसे अमरता का वरदान प्राप्त किया। महादेव की तपस्या से खुश होकर महादेव ने उसको आशीर्वाद देते हुए कहा कि कोई भी महिला या पुरुष तुमको मार नहीं सकता है। भगवान शिव के आशीर्वाद से वह तीनों लोक में जमकर खूब आतंक मचाने लगा। सभी देवता और मनुष्य उस दैत्य के आतंक से परेशान हो गए हैं।

जिसक बाद सभी देवता भगवान शिव के शरण में पहुंचे और महादेव ने उस दैत्य को खत्म करने का फैसला किया। फिर महादेव और मां पार्वती ने अर्धनारी नटेश्वर के रूप में एक नया रूप धारण किया। फिर कार्तिका पूर्णिमा के दिन त्रिपुरासुर को मौत के घाट उतार दिया।

त्रिपुरासुर दैत्य की मौत के बाद उसकी पत्नियां डाकिनी और शाकिनी ने महादेव के पास त्रिपुरासुर के बिना अपने अस्तित्व के बारे में पूछा था। तब भगवान शिव ने दोनों को अमरता का वरदान दे दिया। जो महादेव ने त्रिपुरासुर को प्रदान किया था। तब से भीमाशंकर को 'डाकिन्यांभीशंकरम' के नाम से जाना जाता है।

जानें इस मंदिर से जुड़ी जानकारी

भीमाशंकर मंदिर चारों ओर पहाड़ियों से घिरा हुआ है। मंदिर की करीब 3.5 मीटर चौड़ा और करीब 15 मीटर लंबाई में है। माना जाता है कि छत्रपति शिवजी महाराज ने इस मंदिर का निर्माण कराया था। जिसके बाद इस मंदिर के शिखर को18वीं शताब्दी में नाना फडणवीस ने बनवाया था।

इस ज्योतिर्लिंग से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं। जिसमें एक कथा यह भी है कि कुंभकर्ण के पुत्र का नाम भीम था। वह अपने पिता की मौत का बदला लेना चाहता था। जिसके लिए उसने घोर तपस्या की और ब्रह्माजी से विजय होने का वरदान प्राप्त किया। वरदान पाने के बाद उसने तीनों लोकों में आतंक मचाना शुरूकर दिया था। इसके बाद भोलेनाथ ने भीम राक्षस से युद्ध किया और उसका वध कर दिया था।

जिसके बाद सभी देवताओं ने भगवान से वहीं पर शिवलिंग रूप में विराजमान होने का आग्रह किया। इस आग्रह को महादेव ने स्वीकार कर लिया। तभी से इसको भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जाता है।

अधिकतर समय भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग पर चांदी का श्रृंगार रूपी कवच चढ़ा होता है। जिससे ज्यादातर समय ज्योतिर्लिंग के मूल स्वरूप के दर्शन नहीं कर पाते हैं। केवल कुछ समय के लिए दिन में इसके चांदी के कवच को हटाया जाता है।
शेयर करें: