Hartalika Vrat: हरतालिका तीज व्रत पर भगवान शिव को पाने के लिए मां पार्वती ने की थी हजारों वर्षों की घोर तपस्या

Hartalika Vrat: हरतालिका तीज व्रत पर भगवान शिव को पाने के लिए मां पार्वती ने की थी हजारों वर्षों की घोर तपस्या

हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरतालिका व्रत किया जाता है। इस दौरान भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा-अर्चना की जाती है। यह व्रत मां पार्वती के तप और शिव-पार्वती के पवित्र मिलन का प्रतीक है। हम सभी जानते हैं कि देवी पार्वती ने महादेव को पति रूप में पाने के लिए कई वर्षों तक घने जंगलों में तप किया था। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी पार्वती ने कितने साल तप किया था और इसको लेकर क्या कथा है।

मां पार्वती ने कितने साल तप किया

पौराणिक कथाओं के मुताबिक भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी पार्वती ने हजारों वर्षों बेहद कठिन और घोर तपस्या की थी। पुराणों के अनुसार, देवी पार्वती ने कुल हजारों वर्षों तक अलग-अलग चरणों में तपस्या की थी। देवी पार्वती की अचल भक्ति और प्रेम ने यह साबित कर दिया था कि अगर सच्ची निष्ठा और अटूट विश्वास हो, तो असंभव को भी संभव किया जा सकता है।

सती रूप त्यागकर हिमालयराज के यहां लिया जन्म

देवी पार्वती पिछले जन्म में माता सती थीं। सती रूप में अपना शरीर त्यागने के बाद देवी पार्वती ने पर्वतराज हिमालय के यहां पर पुत्री के रूप में जन्म दिया था। उनके मन में बचपन से ही महादेव के प्रति अगाध प्रेम था और उन्होंने देवर्षि नारद के मार्गदर्शन पर चलकर भगवान शिव को पति रूप में पाने का संकल्प लिया। देवी पार्वती ने अपनी जिद और भक्ति को पूरा करने के लिए राजसी सुख-सुविधाओं को त्यार दिया और जंगलों में कड़ी साधना करना शुरूकर दिया।

देवी पार्वती ने तपस्या के शुरूआती समय में कंद-मूल और फल खाकर की हजारों वर्षों तपस्या की।

समय के साथ देवी पार्वती ने फलों का त्याग कर दिया और सिर्फ पेड़ों से गिरने वाले सूखे पत्ते खाकर व्रत किया।

तपस्या के अंतिम चरणों में देवी पार्वती ने पत्तों का आहार भी छोड़ दिया और वह सिर्फ जल और हवा के सहारे तपस्या करने लगीं। जिस कारण उनका शरीर बेहद क्षीण हो गया था।

हरतालिका तीज की अनसुनी कथा

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया और हस्त नक्षत्र के दिन देवी पार्वती ने पूरा दिन निराहार रहकर बालू से शिवलिंग का निर्माण किया। फिर उन्होंने रात भर जगकर महादेव की पूजा और कठिन निर्जला व्रत किया। इस दौरान उन्होंने सूखे बेलपत्र भी खाने बंद कर दिए। जिसके बाद देवी पार्वती का नाम 'अपर्णा' पड़ा। इसका अर्थ ऐसा व्यक्ति जिसने पत्ते भी न खाए हों।

हरतालिका तीज नाम की कहानी

देवी पार्वती के इस अदम्य तप, बालू के शिवलिंग की पूजा और अटूट संकल्प से तीनों लोक और स्वयं महादेव की समाधि हिल उठी। तब भगवान शिव ने प्रकट होकर देवी पार्वती की तपस्या को स्वीकार किया और देवी पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में पाने का वरदान दिया। क्योंकि देवी पार्वती ने अपनी सखी द्वारा अपहरण कर इस प्रकार सुरक्षित रखा गया था, और उन्होंने ताली के साथ मिलकर यह व्रत किया था, जिस वजह से इस व्रत का नाम हरतालिका व्रत पड़ा।

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