दुर्वासा के शाप से खोया वैभव पाने के लिए देव-असुरों ने किया समुद्र मंथन, प्रकट हुई लक्ष्मी

दुर्वासा के शाप से खोया वैभव पाने के लिए देव-असुरों ने किया समुद्र मंथन, प्रकट हुई लक्ष्मी

हिंदू धर्म में मां लक्ष्मी को धन, ऐश्वर्य और सुख-समृद्धि की देवी माना जाता है। माना जाता है कि मां लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा-अर्चना और व्रत करने से आर्थिक तंगी दूर होती है और कभी धन संबंधी समस्या नहीं होती है। इसके साथ ही दीपावली पर भी मां लक्ष्मी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मां लक्ष्मी के प्रकट होने की कथा क्या है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि मां लक्ष्मी का जन्म कैसे हुआ।

धन की देवी ऐसे हुईं प्रकट

सनातन धर्म में मां लक्ष्मी को वैभव, धन, सुख-समृद्धि की देवी माना जाता है। पौराणिक कथाओं और धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक मां लक्ष्मी का जन्म साधारण माता-पिता के कोख से नहीं बल्कि उनका प्राकट्य ब्रह्मांड के सबसे बड़े और प्रसिद्ध 'समुद्र मंथन' से हुआ था। जब देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था, तो समुद्र में से 14 बहुमूल्य रत्न और दिव्य वस्तुएं निकली थीं।

समुद्र मंथन के दौरान शरद पूर्णिमा के दिन क्षीरसागर से मां लक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था। इसके बाद उन्होंने जगत के पालनहार श्री विष्णु को अपने पति के रूप में चुना था। मां लक्ष्मी की उत्पत्ति सृष्टि में ऊर्जा, धन और सकारात्मकता के संतुलन को स्थापित करने के लिए थी।

समुद्र मंथन की कथा

पौराणिक कथा के मुताबिक देवराज इंद्र और सभी देवता महर्षि दुर्वासा के शाप के कारण अपनी शक्ति और वैभव खो बैठे थे। जिसके बाद स्वर्ग पर असुरों का राज हो गया। ऐसे में इस संकट से उबरने के लिए सभी देवताओं ने भगवान श्रीहरि विष्णु से मदद मांगी। तब श्रीहरि ने देवताओं को क्षीरसागर मंथन करने का उपाय बताया। इस महामंथन के लिए मंदाचल पर्वत को मथानी और वासुकी नाग को रस्सी के रूप में इस्तेमाल किया गया। समुद्र मंथन में मदद पाने के लिए देवताओं ने असुरों से समझौता किया। जिसके बाद देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र की गहराई को मथना शुरू किया।

समुद्र मंथन से निकले 14 रत्न

इस अद्भुत प्रक्रिया में समुद्र मंथन से एक-एक करके कुल चौहद दिव्य और शक्तिशाली रत्न प्रकट हुए।

समुद्र मंथन की शुरूआत में सबसे पहले विष हलाहल निकला। जोकि बेहद घातक और विषैला था। सृष्टि की रक्षा के लिए महादेव ने विष को अपने कंठ में धारण किया और वह नीलकंठ बन गए।

समुद्र मंधन से सभी की इच्छाएं पूरी करने वाली कामधेनु गाय निकली।

इसके बाद सात मुख वाला सफेद रंग का चमकीला और उड़ने वाला उच्चैःश्रवा घोड़ा समुद्र मंथन से निकला।

इंद्रदेव का वाहन ऐरावत हाथी समुद्र मंथन से निकला। यह हाथी सफेद रंग का और ऐश्वर्य का प्रतीक था।

समुद्र मंथन से भगवान विष्णु के वक्ष स्थल पर शोभा पाने वाली सबसे मूल्यवान और जादुई कौस्तुभ मणि निकली।

हर मनोकामना को पूरी करने वाला कल्पवृक्ष समुद्र मंथन से निकला।

समुद्र मंथन से रंभा और मेनका आदि अप्सराएं निकलीं, जोकि सुंदर और कला में निपुण थीं।

समुद्र मंथन से धन, ऐश्वर्य और सौंदर्य की देवी मां लक्ष्मी निकलीं।

मदिरा की देवी वरुणी देवी समुद्र मंथन से निकलीं।

शीतलता और प्रेम के प्रतीक भगवान चंद्रमा का समुद्र मंथन से प्राकट्य हुआ।

जिसकी खुशबू से पूरा लोक महक उठता है, वह पारिजात वृक्ष भी समुद्र मंथन से निकला।

विजय और पवित्रता का प्रतीक दिव्य पाञ्चजन्य शंख भी समुद्र मंथन से निकला।

आयुर्वेद के जनक और देवताओं के चिकित्सक धन्वंतरि हाथ में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए।

समुद्र मंथन से दिव्य अमृत कलश निकला, जिसको पीने से देवता अमर हो गए।

भगवान विष्णु से विवाह

जब समुद्र से चौदहवें रत्न के रूप में मां लक्ष्मी क्षीरसागर से प्रकट हुईं, तो उनके हाथ में कमल का फूल था और वह स्वयं एक खिले हुए कमल पर विराजमान थीं। मां लक्ष्मी के इस अलौकिक और दिव्य सौंदर्य को देखकर असुर और देवता उन पर मोहित हो गए। वहीं मां लक्ष्मी के स्वागत के लिए दिशाएं जगमगा उठीं और गंगाजल से हाथियों ने मां लक्ष्मी का अभिषेक किया।

जब मां लक्ष्मी ने अपनी दृष्टि दौड़ाई तो उन्होंने संसार के पालनहार श्रीहरि को अपने पति के रूप में चुना। उन्होंने भगवान श्रीहरि के वक्ष स्थल पर अपना स्थान ग्रहण किया, तब से वह श्रीविष्णु की अर्धांगिनी और श्री विष्णु की शक्ति माना जाता है।

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