कलियुग चारों युगों में आखिरी युग है। कलियुग की अवधि अन्य तीनों युगों से सबसे कम मानी गई है। वेद पुराण के मुताबिक कलियुग में लालच, अधर्म, हिंसा और अज्ञानता की अधिकता रहेगी। उत्तर प्रदेश में स्थित नैमिषारण्य को एक बेहद पवित्र हिंदू तीर्थ स्थल माना गया है। नैमिषारण्य तीर्थ स्थल को लेकर धार्मिक मान्यता है कि अभी तक इस स्थान पर कलियुग का प्रवेश नहीं हुआ है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको नैमिषारण्य के महत्व के बारे में बताने जा रहे हैं।
जानें कहां स्थित है नैमिषारण्य
बता दें कि यूपी के सीतापुर जिले में गोमती नदी के तट पर नैमिषारण्य तीर्थ स्थित है। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक यह वही स्थान है, जहां पर अभी तक कलियुग का प्रवेश नहीं हुआ है। यानी की नैमिषारण्य कलियुग के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त है।
पवित्र है ये स्थान
कथा के मुताबिक महाभारत के युद्ध के बाद साधु-संत कलियुग की शुरूआत को लेकर काफी चिंतित थे। तब उन्होंने सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी से मदद मांगी और ऐसे स्थान के बारे में पूछा, जो कलियुग के प्रभाव से हमेशा मुक्त रहे। तब ब्रह्माजी ने अपना 'मनोमय चक्र' छोड़ा और कहा कि जहां भी यह चक्र रुकेगा, वह स्थान कलियुग के प्रभाव से मुक्त रहेगा। ब्रह्माजी का चक्र नैमिष वन में आकर रुका, जिसके बाद साधु-संतों ने इस स्थान को अपनी तपोभूमि बना ली।
जानिए नैमिषारण्य का महत्व
महाभारत समेत कई ग्रंथों में नैमिषारण्य का जिक्र एक घने जंगल के तौर पर मिलता है। जिसको नीमषार या नैमिष के नाम से भी जाना जाता है। यह हिंदुओं के सभी तीर्थों में सबसे पवित्र और पहला तीर्थ स्थान माना जाता है। नैमिषारण्य का संबंध ब्रह्माजी, भगवान विष्णु, देवी सती और महादेव से माना जाता है। यहां पर 33 कोटि देवी-देवताओं का निवास भी माना जाता है। इसके दर्शन के बाद ही चार धाम यात्रा पूरी मानी जाती है।
माना जाता है कि अगर कोई इस पवित्र भूमि पर 12 वर्षों तक तपस्या करता है, तो उसको ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। यह जगह विशेष रूप से 84 कोस परिक्रमा के लिए फेमस है। जिसकी शुरूआत फाल्गुम माह की अमावस्या के बाद होती है। इसके अलावा नैमिषारण्य में हनुमान गढ़ी, ललिता देवी मंदिर, व्यास गद्दी और चक्रतीर्थ जैसे प्रमुख स्थान मौजूद हैं।
घटनाएं
नैमिषारण्य में 88 हजार ऋषियों ने तपस्या की थी। इस कारण इसको तपोभूमि भी कहा जाता है।
भगवान श्रीराम ने इसी स्थान पर अपना अश्वमेध यज्ञ पूरा किया था।
माना जाता है कि ब्रह्माजी का चक्र इसी स्थान पर गिरा था।
लोक कल्याण के लिए ऋषि दधीचि ने इसी स्थान पर देवराज इन्द्र को अपनी अस्थियां दान की थीं।