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Mathura-Vrindavan से लौटते वक्त न करें ये Big Mistake, Govardhan का पत्थर ला सकता है दुर्भाग्य

By Astro panchang | Jun 25, 2026

मथुरा और वृंदावन भगवान श्रीकृष्ण की लीला से जुड़े स्थल होने के कारण बेहद पवित्र तीर्थ स्थल माने जाते हैं। यहां की रज को घर लाना बेहद शुभ माना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक ऐसी चीज भी है, जिसको मथुरा-वृंदावन से कभी नहीं लाना चाहिए। हालांकि अक्सर लोग उस एक चीज को अपने घर यह सोचकर ले आते हैं कि इससे उनके घर की सुख-समृद्धि और संपन्नता बढ़ेगी।
 
लेकिन होता इसका उल्टा है। इसको घर लाने से सुख-समृद्धि घटने लगती है। साथ ही राधा-कृष्ण की कृपा दूर होने लगती है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको उस एक वस्तु के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसको मथुरा-वृंदावन से कभी नहीं लाना चाहिए।

मथुरा-वृंदावन से कौन सी वस्तु न लाएं

कई धार्मिक ग्रंथों और विशेष रूप से गर्ग संहिता में यह बताया गया है कि आप यहां से भूलकर भी गोवर्धन पर्वत का पत्थर नहीं लाना चाहिए। ऐसा करना जघन्य अपराध की श्रेणी में आता है, जो अधिकतर लोग अंजाने में बैठते हैं। इसकी पीछे एक अहम वजह है।

धार्मिक कथाओं के मुताबिक हर दिन गोवर्धन पर्वत तिल भर घट रहा है, जिस दिन गोवर्धन पर्वत पूरी तरह से धरती में समा जाएगा, उस दिन कलयुग अपने चरम पर पहुंच जाएगा। माना जाता है कि गोवर्धन पर्वत का हर हिस्सा पूजनीय है, लेकिन एक ऋषि द्वारा श्रापित है।

एक ऋषि द्वारा गोवर्धन पर्वत को यह श्राप मिला था कि कलियुग के अंत तक वह धरती में समा जाएंगे। जिसके बाद से सबसे ऊंचे पर्वतों में से एक गोवर्धन धरती के बहुत करीब है। इस श्राप की पीड़ा से मुक्त करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने उन पर अपने चरण रखे थे।

बता दें कि गोवर्धन पर्वत श्री कृष्ण और राधा रानी के प्रिय माने जाते हैं। यही वजह है कि भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से गोवर्धन का स्वरूप भी उनके जैसा ही है। भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है कि उनको गोवर्धन पर्वत अतिप्रिय है और इनको कोई 84 कोस से बाहर नहीं ले जा सकता है।

यह ब्रज मंडल के मुकुट माने जाते हैं। अगर कोई भी इस पर्वत के किसी भी अंश को ब्रज की सीमा से बाहर ले जाता है, तो यह गिरिराज को उनके मूल निवास से जबरन दूर करने जैसा होता है। जिस कारण उससे भगवान कृष्ण और राधा रानी रुष्ट हो सकते हैं।

गोवर्धन पर्वत के पत्थर को स्वयं श्रीकृष्ण के रूप में पूजा जाता है। जिसको गिरिराज शिला कहा जाता है। ऐसे में किसी भी देवी-देवता के साक्षात स्वरूप को घर लाने का मतलब है कि उनकी पूरी जिम्मेदानी लेना। वहीं इनकी पूजा और सेवा के नियम कठोर हैं।

सामान्य गृहस्थ व्यक्ति के लिए गिरिराज की सेवा और पूजा को निभाना लगभग असंभव है। गोवर्धन शिला को घर पर स्थापित करने के लिए सात्विक जीवनशैली, अत्यधिक पवित्रता और चौबीस घंटे नियम पालन की जरूरत होती है। वहीं नियमों का उल्लंघन करने से व्यक्ति को पुण्य की बजाय महादोष लग सकता है।

धार्मिक मान्यता है कि नियमों में कमी होने पर जातक के जीवन से धन, सुख-समृद्धि और शांति तेजी से चली जाती है और उसका अनिष्ट हो सकता है। इसलिए मथुरा-वृंदावन से ब्रज की रज लाएं, लेकिन गोवर्धन पर्वत के पत्थर को घर न लाएं।
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