By Astro panchang | Oct 05, 2026
51 शक्तिपीठ में मां ज्वाला देवी मंदिर भी शामिल है। ज्वाला देवी मंदिर भगवान शिव और शक्ति को समर्पित है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक जब देवी सती के शरीर को भगवान विष्णु ने अपने चक्र से 51 टुकड़े किए थे, तो यह अंग जहां-जहां गिरे थे वहां-वहां पर शक्तिपीठ बन गए। माना जाता है कि ज्वाला देवी मंदिर में देवी सती की जीव गिरी थी। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित मां ज्वाला देवी मंदिर प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको ज्वाला देवी मंदिर के कुछ रोचक रहस्यों के बारे में बताने जा रहे हैं।
सदियों से ज्वाला देवी मंदिर में बिना तेल बाती और ईंधन के प्राकृतिक रूप से 9 ज्वालाएं जल रही हैं। 9 ज्वालाओं में प्रमुख ज्वाला वह है, जो चांदी के जाला के बीच में हैं और इसको महाकाली कहा जाता है।
वहीं अन्य 8 ज्योतियां अन्नपूर्णा, हिंगलाज, चण्डी, विंध्यवासिनी, सरस्वती, महालक्ष्मी, अंबिका और अंजी देवी ज्वाला देवी मंदिर में वास करती हैं।
इस मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा के मुताबिक भक्त गोरखनाथ यहां पर मां की आराधना करते थे। वह देवी मां के परम भक्तों में से एक थे। एक बाद गोरखनाथ को काफी तेज भूख लगी और उन्होंने माता से कहा कि आप यहां आग जलाकर पानी गर्म करो, वह भिक्षा लेकर आते हैं।
गोरखनाथ के कहने पर माता ने आग जला दी, लेकिन काफी समय बीत जाने के बाद भी गोरखनाथ वापस नहीं लौटे। माना जाता है कि तब से माता अग्नि जलाकर यहां पर गोरखनाथ का इंतजार कर रही हैं। धार्मिक मान्यता है कि सतयुग आने पर ही गोरखनाथ मंदिर लौटेंगे और तब तक यह ज्वाला इसी तरह से जलती रहेगी।
वहीं ज्वाला देवी शक्तिपीठ मंदिर क पास एक चमत्कारी कुंड भी है। जिसको गोरख डिब्बी कहा जाता है। इस कुंड को देखने में लगता है कि मानो कुंड का पानी काफी तेज खौल रहा है, लेकिन जब पानी को आप स्पर्श करते हैं, तो आपको पानी ठंडा लगेगा।
बताया जाता है कि एक बार मुगल सम्राट अकबर ने लोहे के ढक्कन से आग को ढककर और पानी से इसको बुझाने की कोशिश की थी। लेकिन अकबर अपने प्रयासों में बुरी तरह से असफल हुआ था। जिसके बाद उसने मंदिर में सोने का एक छाता भेंट दिया था। लेकिन देवी मां की शक्ति के प्रति अकबर के संदेह की वजह से सोना एक अज्ञात धातु में बदल गया था। इस घटना के बाद से मुगल शासक अकबर ने मन में ज्वाला देवी के प्रति आस्था और भी ज्यादा मजबूत हो गई थी।