हिंदू धर्म में भगवान जगन्नाथ की पूजा का अधिक महत्व माना जाता है। भगवान जगन्नाथ का पावन धाम जिसको धरती का बैकुंठ भी कहा जाता है, वह ओडिशा के पुरी में स्थित है। सात प्राचीन पुरियों में एक इस पावन धाम में भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा और बड़े भाई बलभद्र के साथ विराजमान हैं। समुद्र के किनारे स्थित इस महाधाम की सिर्फ वास्तुकला नहीं बल्कि इससे जुड़े तमाम रोचक रहस्य भी हैं। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको जगन्नाथ मंदिर और इससे जुड़ी रथ यात्रा से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में बताने जा रहे हैं।
लकड़ी से बनी है मूर्तियां
जगन्नाथ पुरी धाम में भगवान जगन्नाथ को श्रीकृष्ण का स्वरूप माना जाता है। यहां पर भगवान जगन्नाथ अपनी बहन सुभद्रा और बड़े भाई बलभद्र के साथ मंदिर के गर्भगृह में विराजमान हैं। मंदिर में तीनों भगवान की मूर्तियां लकड़ी की बनी हैं, जिनको हर 12 साल में बदला जाता है।
अधूरी मूर्तियों की होती है पूजा
हिंदू मान्यता के मुताबिक जब भगवान विश्वकर्मा से राजा इंद्रदयुम्न ने भगवान जगन्नाथ की मूर्तियों को बनाने का निवेदन किया। तो भगवान विश्वकर्मा ने यह शर्त रखी कि वह बंद कमरे में मूर्तियों को बनाएंगे और उस कमरे में कोई भी प्रवेश नहीं करेगा। माना जाता है कि जब जिज्ञासावश राजा इंद्रदयुम्न ने कमरे के पट खोल दिए, तो भगवान विश्वकर्मा अधूरी मूर्ति छोड़कर चले गए। तब से लेकर आज तक भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और भगवान बलभद्र की अधूरी मूर्तियों की पूजा की जाती है।
जगन्नाथ की रथयात्रा
हर साल आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पर भगवान जगन्नाथ अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र के साथ रथ यात्रा पर बाहर निकलते हैं। यह रथ यात्रा जगन्नाथ मंदिर से शुरू होकर गुंडिचा मंदिर तक जाती है। फिर भगवान जगन्नाथ 9 दिनों बाद वापस अपने धाम को लौटकर आते हैं।
मंदिर का मुकुट है सुदर्शन चक्र
जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर लगे सुदर्शन चक्र को मंदिर का चमत्कारी मुकुट भी कहा जाता है। आप इसको जिस भी तरफ से देखेंगे, यह आपको अपनी ओर घूमा हुआ नजर आएगा। मंदिर के शिखर पर बने सुदर्शन चक्र के दर्शन करना बेहद पुण्यदायी माना जाता है।
हवा के विपरीत लहराता है ध्वज
भगवान जगन्नाथ धाम के ऊपर लहराता हुआ ध्वज अपने आप में विशेष है। भगवान के मंदिर का यह ध्वज रोजाना बदला जाता है। यह परंपरा आज भी है। इस मंदिर के ध्वज की यह खासियत है कि यह हमेशा हवा के विपरीत लहराता है।
भगवान जगन्नाथ का भोग
भगवान जगन्नाथ की रसोई भी बेहद खास है। यहां पर रोजाना भगवान के लिए विशेष रूप से तमाम तरह के भोग बनकर तैयार किए जाते हैं। जिसको आप चढ़ाए जाने के बाद ही मंदिर परिसर से प्राप्त कर सकते हैं।
कैसे पकता है भगवान जगन्नाथ का भोग
भगवान जगन्नाथ का भोग बेहद पवित्रता के साथ रोजाना मिट्टी के बर्तन में पकाया जाता है। मंदिर परिसर में स्थित रसोई में चूल्हे पर मिट्टी के बर्तन एक के ऊपर एक रखे जाते हैं। वहीं सबसे ऊपर रखे बर्तन का भोग सबसे पहले पकता है और जो नीचे वाली मटकी होती है, उसका भोग सबसे आखिरी में पकता है।
कम नहीं पड़ता महाप्रसाद
जब भोग को भगवान जगन्नाथ के लिए रसोई से मंदिर की ओर ले जाया जाता है। तो उस रास्ते के बीच में कोई भी नहीं आता है। वहीं यहां के महाप्रसाद की एक खासियत यह भी है कि यहां पर कितने ही भक्त आएं, लेकिन भोग समाप्त नहीं होता है। धार्मिक मान्यता है कि जगन्नाथ धाम पर हर पल मां अन्नपूर्णा और मां लक्ष्मी की कृपा रहती है। वहीं यहां पर कभी खाना बचता भी नहीं है।
मंदिर के ऊपर से नहीं गुजरते पक्षी और जहाज
भगवान जगन्नाथ धाम मंदिर के ऊपर के एक भी पक्षी या जहाज नहीं गुजरता है। वहीं जगन्नाथ मंदिर की कभी भी परछाई नहीं बनती है।